ऐतिहासिक फिल्म पदमावत से सीखें ये 9 बातें | POPxo Hindi | POPxo
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बहुचर्चित फिल्म 'पद्मावत' हमें देती है इन 9 बातों की सीख

बहुचर्चित फिल्म 'पद्मावत' हमें देती है इन 9 बातों की सीख

संजय लीला भंसाली की फिल्म का नाम पद्मावती से पद्मावत हो गया, और तमाम विरोधों के बावजूद पब्लिक के लिए इसका रिलीज़ भी हो गया। फिल्म को देखकर लोगों को भी तसल्ली हो गई। फिल्म के रिलीज़ का इतना विरोध होने और इसपर हो रहा विवाद वजह हो या फिर संजय लीला भंसाली की बड़े बजट की फिल्मों के प्रति लोगों के नज़रिये का असर, पद्मावत को देखने के लिए इतने लोग उतावले हो रहे थे कि पूछो मत। अब इन उतावले हो रहे लोगों को इसे देखना नसीब हो गया है।


अब हमने भी प्रेस प्रिव्यू के दौरान यह फिल्म देख ली है। फिल्म को देखकर हम तो हैरान हैं कि इस पर इतना बावेला क्यों हो रहा था भाई...। जिस फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मावती के बीच अंतरंग दृश्यों की बात सुनने में आ रही थी, वहां हमें तो सिर्फ एक झलक को छोड़कर ठीक से उनका आमना-सामना होता भी नहीं दिखा। ऐसे में राजपूताना शान को झटका लगना तो एक छटांक भी कहीं नहीं दिखता। ऐसे में राजपूत अपनी बात को बचाए रखने के लिए कुछ और दूसरे आरोप लगाने लगे तो कहा नहीं जा सकता...।


खैर, हमें तो इस फिल्म में कुछ बातें ऐसी समझ में आई हैं, जो वाकई आने वाली अपनी जिंदगी में सीख लेने लायक हैं। इनमें से कुछ हम आपको भी बता सकते हैं-


1. किसी पर भी आंख बंद करके भरोसा न करना


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इस पूरी फिल्म में सबसे बड़ा सबक जो मिला है वह है कि किसी भी व्यक्ति पर, चाहे वह आपका कितना भी सगा संबंधी क्यों न हो, आंख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए। यह बात इस फिल्म में एक बार नहीं, बार-बार समझाई गई है। जैसे जलालुद्दीन खिलजी ने जब अलाउद्दीन पर भरोसा किया तो उसने उसकी हत्या करके उसका पूरा राजपाट हड़प कर हमें ये सिखाया कि किसी पर भी भरोसा करना ठीक बात नहीं है। भरोसा करें, लेकिन साथ में उस व्यक्ति को चेक भी करते रहें।


2. अपने आत्मसम्मान के लिए जीना और मरना


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दूसरी और सबसे बड़ी सीख फिल्म के अंत में राजपूताना महिलाओं का जौहर वाला दृश्य हमें दे गया। पद्मावती का महल की दूसरी सभी महिलाओं के साथ किया जाने वाला जौहर यानि अपने आत्मसम्मान के लिए एकसाथ आग में कूदकर आत्महत्या करना हमें यह सिखाता है कि अपने आत्मसम्मान के लिए अगर हमें अपना सब कुछ भी गंवाना पड़े तो उससे पीछे नहीं हटना चाहिए।


3. विपरीत परिस्थिति में भी सोच समझ कर निर्णय लेना


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कितनी भी कठिन और विपरीत परिस्थिति हो, हमें पूरे संयम के साथ काम लेना चाहिए और सभी निर्णय पूरी तरह से सोच- समझ कर करना चाहिए। यह सीख भी हमें यह फिल्म कई जगह देती है। जैसे, जब अलाउद्दीन खिलजी राजा रतनसिंह को अपने साथ ले गया था और उसने पद्मावती को संदेश भिजवाया था कि अगर राजा को वापस लेकर जाना है तो यहां स्वयं आकर ले जाएं। ऐसे में जब महल के सारे सिपहसालार उन्हें वहां भेजने के लिए असहमत थे, वहां रानी पद्मावती ने संयम से सोच- समझ कर वहां जाने का निर्णय किया, लेकिन ऐसे समय वहां पहुंची जब सभी लोग नमाज पढ़ रहे थे, ताकि उनका सामना कम से कम लोगों से हो और वे अपनी इस तरकीब में सफल भी हो गईं और राजा को वापस लेकर ही लौटीं।


4. बुरे व्यक्ति की संगत न करना


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यह फिल्म हमें यह भी सिखाती है कि जानबूझकर किसी भी बुरे व्यक्ति की संगत करना अपने लिए खतरा मोल लेने के बराबर है। फिल्म में राजा रतनसिंह ने जब अपने पुरोहित को देशनिकाला दे दिया था, तब वह गुस्से में अलाउद्दीन खिलजी से जा मिला। वह जानता था कि खिलजी के लिए किसी की भी हत्या करना कोई बड़ी बात नहीं है। अलाउद्दीन की संगत का मोल उसे अपनी जान देकर चुकाना पड़ा। आखिरकार अलाउद्दीन जैसे स्वार्थी और क्रूर व्यक्ति ने पद्मावती की यह शर्त आसानी से मान ली कि वह तभी वहां आएगी, जब पुरोहित का सर उसे भेंटस्वरूप भेजा जाएगा।


5. सिर्फ शान के लिए अपना नुकसान न करना


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हमारे इतिहास में राजसी और खासतौर पर राजपूताना शानो-शौकत की अनेक गाथाएं हैं, लेकिन आज के संदर्भ में यह बातें वैसी नहीं रही हैं। यह फिल्म हमें यह शिक्षा देती है कि सामने वाले को देखकर उसी के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। जैसे कि राजा रतनसिंह ने कई बार अपने राजपूताना सिद्धांतों की वजह से अलाउद्दीन खिलजी की जान बख्श दी, जबकि अलाउद्दीन खिलजी ने कभी भी सिद्धांतों का पालन नहीं किया और राजा रतनसिंह की मृत्यु भी सामने से नहीं बल्कि पीछे से लगे तीरों की वजह से हुई। अगर वे पहले ही खिलजी की हत्या कर देते तो ऐसा दिन देखने को नहीं मिलता।


6. अपने दुख से दूसरों को दुखी न करना


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फिल्म में दूसरों के लिए अपना बलिदान देना और अपने दुख से दूसरों को दुखी न करने की भी शिक्षा दी गई है। जैसे राजा रतनसिंह के सिपहसालार गोरा और बादल जब उनके लिए लड़ते हुए शहीद हो जाते हैं और राजा और रानी उनके बिना ही वापस महल पहुंच जाते हैं तो गोरा-बादल की माता अपने दुख को उनके सही सलामत आने की खुशी के आगे किसी के सामने नहीं दर्शाती और उनकी इस खुशी में सम्मिलित हो जाती है। इस बात को रानी पद्मावती ने विशेष रूप से कहकर जताया भी है।


7. हमेशा सच्चाई का साथ देना


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इस फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी की पत्नी मेहरुन्निसा ने हमें एक सीख और दी है और वो है कि चाहे कुछ भी हो, आपको हमेशा सच्चाई का साथ देना चाहिए। फिल्म में मेहरुन्निसा जानती थी कि उसका पति गलत काम कर रहा है। वह चाहकर भी उसे बदल नहीं सकती थी तो उसने रानी पद्मावती का साथ देने का निर्णय किया और उसे अपने महल से भाग जाने में मदद की। हालांकि इसके लिए उसे बाद में अलाउद्दीन खिलजी के भयानक गुस्से का भी सामना करना पड़ा।


8. नीयत देखकर ही किसी से दोस्ती करना


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दोस्ती हमेशा किसी को अच्छी तरह से देख- परख कर ही करनी चाहिए। यह शिक्षा भी फिल्म पद्मावत हमें देती है। राजा रतनसिंह ने अलाउद्दीन खिलजी का बुलावा यह मानकर स्वीकार कर लिया था कि वो उनसे दोस्ती करना चाहता है, जबकि उसकी नीयत तो कुछ और ही थी। और हुआ भी वही, जब राजा रतनसिंह वहां भोजन के निमंत्रण पर पहुंचे तो उसने उन्हें बंदी बना लिया। ऐसे में हमें शिक्षा मिलती है कि किसी का भी आमंत्रण या दोस्ती को उसकी नीयत अच्छी तरह से समझ कर ही स्वीकार करना चाहिए।


9.अपनी इच्छा के लिए दूसरों को परेशान न करना


फिल्म में खलनायक और क्रूर शासक अलाउद्दीन खिलजी द्वारा सबको परेशान करना और अंत में रानी पद्मावती के जौहर के माध्यम से उसकी हार दिखाना यह सीख देता है कि सिर्फ अपनी इच्छा के लिए किसी को भी परेशान करना गलत काम है। ऐसे कामों के लिए ईश्वर कभी आपको माफ नहीं करता और आप गलत काम करके कभी जीत हासिल नहीं कर सकते।


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Published on Jan 24, 2018
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