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स्त्रियां तो युगों युगों से सती हुई हैं, आज एक युग सता का भी हो जाए..

स्त्रियां तो युगों युगों से सती हुई हैं, आज एक युग सता का भी हो जाए..

कैसा ये दुर्भाग्य है अपने भारतीय समाज का जहां देवी की पूजा होती है, हर गली में माता की चौकी माता का जागरण, जागराता किया जाता है उसी देश में उसी धरती पर किसी गली, किसी मोहल्ले, यहां तक कि अपने घरों तक में भी जीती जागती देवियां सुरक्षित नहीं हैं। ऐसा निर्लज्ज समाज जहां 21 वीं सदी के प्रगतिशील समय में भी स्वयं प्रधानमंत्रीजी को कहना पड़ता है - बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ!


देश की सती प्रथा


कहते हैं हिंदुस्तान में कभी सती प्रथा थी, पति की मृत्यु हो जाए तो पत्नी उसके साथ ही चिता में सोलह श्रृंगार कर दुल्हन सी सज कर बैठ जाती थी और इस जल कर मर जाने को, इस सती प्रथा को इतना महिमा मण्डित किया गया कि आह! देखो तो कैसी साक्षातदेवी स्वरूपा है, कितनी भाग्यवान! कितना प्रेम, कितनी श्रद्धा कितनी चरित्रवान स्त्री है कि पति के बिना एक दिन भी जी सकेगी ! ख़ुद ही मृत पति का शरीर अपनी गोद में ले बांहों में हंसते हंसते उसी के साथ प्राण भी त्याग देगी, ऐसी पतिव्रता की याद में सती माता का चौरा बनेगा और सदियों तक पूजा जाएगा!


सती प्रथा की असलियत


सत्य क्या है जानते हैं? पति की मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति उसकी ज़मीन जायदाद खेत-खलिहान गाय- बैल सब पर पत्नी का कोई अधिकार न हो ताकि आसानी से उन सब पर क़ब्ज़ा किया जा सके और इसका सबसे आसान तरीक़ा यही था कि पत्नी जीवित ही ना रहे और सारी सम्पत्ति फिर आसानी से हथियाई जा सके! सो अब सत्य की कसौटी पर परखा जाए तो आसानी से तो कोई स्त्री क्यों जलना चाहेगी, क्यों प्राण त्यागना चाहेगी? इसके लिए रचा गया एक प्रपंच और उसे धर्म का जामा पहनाया गया कि शास्त्रों में ऐसा लिखा है कि पतिव्रता सती सीधी स्वर्ग जाती है और साथ ही श्रृंगार के प्रलोभन, ऐसे कि साक्षात देवी ही समझने लगे ख़ुद को स्त्री, उत्सव जैसा माहौल बने, पूजा हो, झुंड के झुंड दूर दराज़ के गांव से आ आ कर पैर छुएं,आशीर्वाद लें, जय-जयकार करें और जो स्त्री आसानी से ना माने तो उसे अफ़ीम या ऐसा ही कोई नशा दे कर अवचेतन अवस्था में चिता पर बैठा दिया जाए। शरीर जले तो दर्द से चीख़ती स्त्री की आवाज़ ढोल नगाड़ों की आवाज़ के बीच दब कर रह जाए, शोर में सुनाई ही ना दे! ये है सच सती का!


फिल्म पर बवाल


अभी कुछ समय पहले तक एक फ़िल्म के प्रदर्शन को लेकर ख़ूब हंगामा हुआ, शहर शहर गाड़ियां जलाई गईं, उपद्रव हुआ, बन्द रखे गए, दुकानो के शीशे तोड़े गए, गाड़ियां जलाईं गईं, शहर शहर ख़ूब तोड़ फोड़ हुई, सिनेमा हॉल में बवाल हुए और फिर यकायक अचानक फ़िल्म रिलीज़ क्या हुई कि सब शांत भी हो गया! जिस घूमर गीत नृत्य पर राजस्थान में विद्रोह के स्वर गूंजे थे, उसी राजस्थान में नहीं सारे बल्कि विदेशों तक में आज हर विवाह समारोह में वही गीत ज़ोर शोर से बजाया जा रहा है और महिलाएं राजसी पोशाक, गहने पहन ख़ूब मस्ती से नाच गा भी रही हैं! जिस पब्लिसिटी की ओछी राजनीति को चमकाने के लिए सारा राजपूत समाज सड़कों पर उतर आया था, ललकार रहा था कि अगर फ़िल्म रिलीज़ की गई तो हमारी राजपूत महिलाएं जौहर करेंगी और जैसा कि टेलिविज़न में बार बार समाचारों में दिखता रहा कि हाथ में तलवार लिए क्षत्रानियां भी कहती रही ज़ोर शोर से कि हमारी पदमवती रानी के सम्मान की रक्षा के लिए हम जान दे देंगे।


राजपूत स्त्रियों से निवेदन


तो भाई राजपूतनियों ही नहीं, सभी बुद्धिमती स्त्रियों से निवेदन है कि कम से कम अब तो 21वीं सदी में अक़्ल से काम लें। राजपूत स्त्रियां भी और कम से कम पब्लिक में ना सही अपने अपने घरों में ही पूछ लें अपने बींद से कि हे जी हम जौहर काहे करें? ग़ुस्सा आप का है फ़िल्म पर तो आप जलो ना! अच्छा चलो जौहर की तो छोड़ो, अपनी पैर की छोटी सी एक उंगली ही जला के दिखाओ कि इतना परोक्ष आक्रामक प्रदर्शन सड़क पर कैसे कर लेते हो जी? ऐसा उबलता विद्रोह, ऐसा विरोध का एक छोटा सा नमूना घर में तो दिखाइए पहले, आख़िर हम तो जौहर को समूचे तैयार हैं ही, आप छोटी सी उंगली भर ही जलाइए !


चाणक्य का सूत्र

चाणक्य का एक सूत्र है कि अग्नि चाहे पैरों में रहे चाहे सिर पर, उसका स्वभाव ही है कि वो जलाती ही है! स्त्रियां युगों युगों से जलती आयीं हैं, आज एक युग सता का भी हो, क्यूं न पुरुष करें अग्नि वरण, करें फ़िल्म के विरोध में सामूहिक सार्वजनिक जौहर !
स्वयं विचार कीजिए।


इन्हें भी देखें -





Published on Mar 4, 2018
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