#DreamWithMe: Corporate की जॉब छोड़कर वो ये करने लगी... | POPxo

#DreamWithMe: Corporate की जॉब छोड़कर वो ये करने लगी...

Garima Singh

Guest Contributor

एमबीए कर कॉर्पोरेट सेक्टर में जॉब करने के बाद क्या कोई सोच सकता है कि वो ऐसी जगह जाकर रहे जहां बिजली और पानी जैसी basic facilities भी न हों! सोचकर ही कितना uncomfortable हो जाते हैं हम। लेकिन ऐसा उस लड़की ने कर दिखाया जो सभी सुविधाओं और luxurious life के साथ मैट्रो सिटीज़ में रही हैं। ये हैं राजस्थान के सोढा गांव की सरपंच छवि राजावत। देश की पहली महिला सरपंच जो MBA हैं। जिनका कॉर्पोरेट सेक्टर में अच्छा करियर रहा है। छवि किसी मॉडल और बॉलीवुड एक्ट्रेस सरीखी दिखती हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ में आयोजित 11 वें इन्फो पॉवर्टी विश्व सम्मेलन में दुनिया भर से मंत्रियों और राजदूतों को छवि ने संबोधित किया। इस सम्मेलन में जब छवि का परिचय INDIA के एक गांव की सरपंच के तौर पर कराया गया तो सब Surprised हो गए।

1.आसान तो कुछ भी नहीं है


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छवि कहती हैं, पढ़ाई के बाद किसी बेहतर कंपनी के साथ काम करना हो या गांव की सरपंच होकर यहां की दिक्कतें दूर करने की कोशिश करना दोनों ही जगह संघर्ष तो है ही। हां, मेरी पढ़ाई, बाहर रहने के अनुभव और लिंक्स का फायदा मुझे जरूर मिलता है। एकाएक लाइम लाइट में आ जाना और हजारों लोगों की उम्मीद आपसे जुड़ जाना positive ही सही एक pressure तो बनता ही है आप पर। सरपंच बनने के बाद जब मैंने काम के सिलसिले में सरकारी offices में जाना और लोगों से मिलना शुरू किया तो अक्सर मुझे seriously नहीं लिया जाता था। उन्हें लगता कि मुझे मिली लाइम लाइट को enjoy करने के लिए मैं काम का दिखावा कर रही हूं। लेकिन धीरे-धीरे चीजें बदलने लगीं।

2. मेरे गांव ही नहीं जिले की दिक्कत है


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अपने गांव में पानी की कमी से निपटना मेरे लिए सबसे बड़ा चैलेंज था और काफी हद तक अभी भी है। मेरा गांव सूखे की समस्या से जूझता है। शुरू में मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करुं? हमारे गांव का तालाब जो देखभाल न होने की वजह मिट्टी से भर गया था, मैं बारिश से पहले उसे साफ कराना चाहती थी। ताकि गांव में पानी की problem से कुछ हद तक राहत मिल सके। इसके लिए मैंने हर संभव कोशिश की लेकिन हमें सरकारी मदद नहीं मिल पाई। फिर मैंने अपने स्तर पर कॉर्पोरेट कंपनीज़ में बात की, ये सोचकर कि CSR ( कॉर्पोरेट सोशल रेस्पॉन्सब्लिटी) के तहत शायद हमें मदद मिल जाए। लेकिन हमारा गांव उनके रीज़न में नहीं आता था। फिर मेरी फैमिली और रिलेटिव्स ने मिलकर 20 लाख रुपए लगाकर तालाब ठीक कराया। इसके बाद गांव वालों ने आगे बढ़कर मदद की।

3.आसान नहीं था ये फैसला लेना


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मैं मेट्रो सिटी में रही, पढ़ाई की, जॉब किया ये अलग बातें है लेकिन मेरी roots तो गांव में ही हैं। मैं अक्सर छुट्टियों में अपने गांव आती थी और यहां की दिक्कतों के बारे में, जरूरतों के बारे में जानती थी। लेकिन तब पानी की कमी इतनी महसूस नहीं होती थी जितनी कि यहां लगातार लंबे समय तक रहने पर समझ आई। अब मैं इन्हें दूर करने के लिए जिम्मेदार हूं। बचपन से ही घर में सिखाया गया है कि किसी भी person को उसका economical status देखकर जज मत करो। मेरे दादाजी आर्मी में थे और मेरे पैरेंट्स सोशल वर्कर हैं। दरअसल मेरे दादाजी स्कूल में पढ़ते थे जब वो शहर में रहने के लिए चले गए। फिर जब अपने retirement के बाद वो लौटे तो तब तक उनके गांव की हालत वैसी ही थी, जैसी वो छोड़कर गए थे। यह देखकर उन्होंने पंचायत चुनाव लड़े और जीते। लगातार 3 बार गांव के सरपंच रहे। अपने गांव में बहुत काम किया। इसी कारण अब गांव वालों की पसंद मैं बनी। मेरे जॉब छोड़कर गांव आने का decision आसान नहीं था। एक तरफ करियर ग्रोथ और opportunities थी तो दूसरी ओर गांव वालों की उम्मीदें।

4. सहुलियतों में रहने के वाबजूद मुश्किल भरा रास्ता


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छवि की एजुकेशन ऋषि वैली स्कूल, बेंगलुरू और मेयो कॉलेज गर्ल्स स्कूल, अजमेर में हुई। उन्होंने दिल्ली के लेडी श्री राम कॉलेज से Graduation किया और पुणे के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ माडर्न मैनेजमेंट से एमबीए। स्ट्रगल के बारे में छवि की thinking एकदम अलग है। वो कहती हैं, खुद को प्रूव करने के लिए हर किसी को हर स्तर पर संघर्ष करना पड़ता है। जो किसी level पर पहुंचना चाहते हैं वो वहां पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और जो किसी स्तर पर हैं वो वहां बने रहने के लिए। मैं एक ऐसे परिवार से हूं जहां हर काम के लिए freedom और support मिला। लेकिन सरपंच बन जाना बस फेमस हो जाना नहीं है। मेरे गांव के लोगों की उम्मीदें और सपने मुझे पहले से अधिक जिम्मेदार हो जाने का अहसास दिलाते हैं…

5. गांव के लोगों में बहुत प्यार होता है


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मुझे सरपंच बनाने का विचार मेरे गांव वालों का था। सारी तैयारियां भी उन्होंने ही की। मुझे जींस-टॉप और फिटेड कपड़े पहनकर पंचायत में बैठने में कोई दिक्कत नहीं होती। क्योंकि मैं इस गांव की बेटी हूं। सरपंच बनने के लिए मुझे कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा। मेरा संघर्ष तो सरपंच बनने के बाद शुरू हुआ। क्योंकि मैं जिस कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करती थी, जो पूरी तरह organized है और अब मैं जहां काम कर रही हूं वो तकरीबन पूरी तरह unorganized. हालात धीरे-धीरे बदल रहे हैं। मेरे गांव के आस-पास के सरपंच भी मेरी policies में भरोसा रखते हैं। इतना कि मेरी work policy को वो अपने यहां implement करने को तैयार रहते हैं।

6. Education नहीं awareness है सफलता की key


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मैं अपने अनुभवों के आधार पर कह रही हूं कि एजुकेशन बहुत जरूरी है लेकिन सफलता के लिए इतना ही काफी नहीं है। इसके लिए अवेयर होना बहुत जरूरी है। मैं अपने गांव में महिलाओं और यूथ को लेकर आगे बढ़ रही हूं। महिलाओं से education/ health जैसे issues पर बात करती हूं तो youngsters को departments और funding के बारे में बताती हूं। ताकि उन्हें राइट्स और प्रोसीज़र पता चले। मैं सरपंच काम करने और मॉडल्स को लागू करने के लिए बनी हूं। सरकार, नॉन गवर्नमेंट सेक्टर्स और गांव वालों के बीच ब्रिज का काम करना चाहती हूं। ...और मैं इस राह पर बढ़ रही हूं।

Images: Chavi Rajawat FB Profile
Published on Dec 01, 2015
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