#DilSeDilli: लोगों के लिए वो आवाज़ 'अजीब' थी, पर गूंजी तो... | POPxo

#DilSeDilli: लोगों के लिए वो आवाज़ 'अजीब' थी, पर गूंजी तो...

Riwa Singh

Writer, Hindi, POPxo

दिल वालों की दिल्ली में लोगों का आना-जाना लगा ही रहता है। लोग नए सपनों के साथ धड़कती हुई दिल्ली को महसूस करने आते हैं और कई बार यहीं के होकर रह जाते हैं। देश के हर कोने से दिल्ली आई लड़कियां कैसे जीती और महसूस करती हैं दिल्ली को, और दिलवालों की दिल्ली उन्हें कितना अपनाती है.. ये हम बताएंगे आपको हर बार ‘DilSeDilli’ में।

इस बार DilSeDilli में हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश (अलीगढ़) से आयी दिव्या की। दिव्या ने दिल्ली युनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म में graduation और P.G. Diploma किया है। इन्हें लिखने और गाने का बहुत शौक है। दिव्या अपने कॉलेज के दिनों में खूब debate और anchoring करती थीं, वही स्टेज का शौक इन्हें जर्नलिज़्म में ले आया...लेकिन यह राह इतनी आसान भी नहीं थी।

1. आप दिल्ली कब और क्यों आईं?


मुझे दिल्ली आए 6 साल हो गए। दिल्ली आने की मुख्य वजह थी जर्नलिज़्म। मुझे शुरू से debates और speeches का बहुत शौक था। स्कूल टीचर्स भी कहते थे कि मुझे जर्नलिज़्म में जाना चाहिए और इसीलिए मैंने मेडिकल छोड़कर इसे चुना। आपको पता है, छोटे शहरों में ये जानना थोड़ा मुश्किल होता है कि कहां क्या हो रहा है और हम उसमें कैसे participate कर सकते हैं, इसके चलते कई चीज़ें मिस हो जाती हैं। Thank God! हम इंटरनेट के दौर में हैं.. नहीं तो मुझे शायद दिल्ली युनिवर्सिटी में पढ़ने का मौका नहीं मिलता। मुझे पता चला कि D.U. जर्नलिज़्म में graduation कराती है और मैं यहां आ गई। :)

3. दिल्ली में कदम रखने के बाद आपका पहला reaction क्या था?


अब तो सब कुछ बहुत अच्छा लगता है पर जब मैं आयी थी तो मेरी हालत खराब हो गई थी। मैं कुछ भी खाने की कंडीशन में नहीं थी, यहां का atmosphere था, pollution था या फिर कुछ और.. पर मैं दिल्ली में कदम रखते ही अजीब फील करने लगी और फिर थोड़ी देर में ही vomiting शुरू हो गई। मैं एडमिशन लेने तक अपने relative के यहां थी और आप यकीन नहीं करेंगी, मैं घर से बाहर निकलना नहीं चाहती थी क्योंकि बाहर आते ही मेरी तबीयत खराब होने लगती थी। दूसरी चीज़ यहां की महंगाई.. मैं यहां पहली बार आई तो 4 दिन रही थी और ऑटोवालों ने मुझे इतना बेवकूफ़ बनाया कि करीब 3 हज़ार सिर्फ़ ट्रैवेल में खर्च हो गए थे.. बहुत पैसे खर्च होते थे, मैं कुछ भी मैनेज नहीं कर पा रही थी।

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3. घरवालों ने यहां आने को लेकर कितना सपोर्ट किया?


घर से मुझे पूरा सपोर्ट मिला, पैरेंट्स बहुत खुश थे क्योंकि डीयू में आना किसी सपने के सच होने जैसा था। शुरूआत में थोड़ी financial problems भी थीं पर डैडी ने कभी मुझे ये फील नहीं होने दिया, “तुम्हें जिसमें interest हो वही करो, हमारे तरफ़ से कोई प्रेशर नहीं है” - डैडी ने यही कहा था। मम्मी ने भी कहा कि, “तुम्हें जहां एडमिशन लेना है लो, किसी और के कहने पर influence मत होना।”

4. क्या हमेशा से दिल्ली आने का मन था?


मैं बचपन से ही खूब प्लानिंग करती थी.. आप उसे fantasy भी समझ सकती हैं। दिल्ली क्या.. मेरा तो Cambridge और London जाने का भी मन था, लेकिन हां.. इस planning की शुरूआत दिल्ली से होती थी। अलीगढ़ में बैठकर लगता था कि दिल्ली के लोग president से ये क्यों नहीं पूछते? ऐसा क्यों नहीं करते? मैं होती तो फलां-फलां काम करती, तो इस तरह लगता था कि यहां आकर मैं बहुत कुछ कर पाऊंगी। :D

Don't get influenced

5. जो सपने देखे थे उसे दिल्ली ने कैसे और किस हद तक पूरा किया?


दिल्ली आकर ये एहसास हुआ कि सिर्फ़ अच्छा बोलने और लिखने से मैं पत्रकार नहीं बन सकती क्योंकि तमाम लोग बैठे हैं जो अच्छा लिखते और बोलते हैं। कोर्स करते-करते ये एहसास भी हो गया कि जर्नलिज़्म की दुनिया में भी glamour है इसलिए ये भी उतना आसान नहीं है.. अच्छी approach भी यहां बहुत मायने रखती है पर कुल मिला कर develop करने के लिए अच्छा माहौल मिला। डीयू में पढ़ने वाले इसे बेहतर समझ सकते हैं।

6. यहां आने के बाद अपने struggle के बारे में बताएं।


जब ये पता चल गया कि टैलेंट ही काफी नहीं है तो चीज़ें अपने आप ही मुश्किल होती गईं। Godfather जैसी चीज़ों का कभी सपोर्ट नहीं मिला। मैंने कॉलेज में भी debate जारी रखी और कॉलेज और युनिवर्सिटी  के सारे functions में anchoring भी करती रही, इस चीज़ ने मेरा confidence boost-up किया। किसी बात ने निराश किया तो वो थी मेरी अलग आवाज़। कुछ लोगों को बेहद पसंद आती थी तो कुछ लोग इसे ‘अजीब’ मानते थे। ऐसे में मुझे रिपोर्टर बनना मुश्किल लगने लगा था। मुझे याद है कॉलेज की एक टीचर मेरी आवाज़ के लिए हमेशा टोकती थीं, - “दिव्या! तुम्हारी आवाज़ न, थोड़ी अलग है, तुम अच्छा गा सकती हो पर एंकरिंग मुश्किल है तुम्हारे लिए।” उनके ये कहते ही मुझे मेरा सपना टूटता-सा लगता था।

All India Radio में हिंदी न्यूज़ रीडर की vacancy आई थी। मुझे पता चला तो धक्-सी हो गई क्योंकि interest तो बहुत था पर किसी से कह नहीं सकती थी। ख़ैर पहले इसके लिए written exam हुआ जिसे मैंने आसानी से qualify कर लिया पर उसके बाद था voice test। आकाशवाणी जैसी जगह पर pronunciation कितना मायने रखता है ये सब जानते हैं, इसमें मैं confident थी। परेशान इसलिए थी कि रेडियो जैसे medium में आवाज़ ही पहचानी जाती है और मेरी आवाज़.. उफ़्फ़! ऑडिशन से पहले मैंने खूब मेहनत की, रोज़ news reading की प्रैक्टिस भी करती थी पर फिर भी डर लगता था क्योंकि लोगों की नज़र में तो मेरी आवाज़ अच्छी नहीं बल्कि ‘अजीब’ थी!! मैंने पता नहीं कितने महीनों तक ठंडा पानी भी नहीं पीया था, किसी पर चिल्लाती भी नहीं थी :D ये सोचकर कि आवाज़ खराब हो जाएगी। मेरी मेहनत रंग लाई और ये ‘अजीब’ सी आवाज आकाशवाणी के टेस्ट में पास हो गई!!! आह!! क्या फील थी वो...मेरी सफलता का पहला स्टेप था वो। मुझे आज भी याद है जब पहली बार मेरी आवाज़ on-air हुई थी और मैं लगभग पागल-सी हो गई थी - “नमस्कार! आकाशवाणी से प्रस्तुत हैं समाचार प्रभात।” :D

news reader

7. दिल्ली ने खुशी दी या निराश किया?


दिल्ली ने मुझे बहुत सारी खुशियां दीं, मुझे सोचने के नए आयाम दिए.. समझने का तरीका सिखाया। बेबाक लिखने के लिए प्रेरित किया। दिल्ली ने मुझे दिव्या बनाया।

8. दिल्ली क्यों सबसे अलग है?


दिल्ली बहुत energetic है, दिल्ली बिंदास है। यहां के लोग बहुत speedily सब कुछ करते हैं और हर चीज़ के लिए वक्त भी निकालते हैं। दिल्ली हम जैसे दूसरे राज्य के लोगों को भी बाहें फैलाए अपनाती है, इससे ज्यादा आपको किसी शहर से क्या चाहिए।

9. दिल्ली को अगर तीन शब्दों में बयां करना हो तो..


दिल्ली lively है, दिलचस्प है और inspiring भी..यहां से कभी किसी का interest खत्म नहीं हो सकता।

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Images: shutterstock.com
Published on Dec 02, 2015
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