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#DreamWithMe: क्योंकि अभी तो पूरा आसमान बाकी है!

Garima Singh

Guest Contributor

एक 24 साल की लड़की, जिसे कुछ बदमाश चलती ट्रेन से फेंक देते हैं। दूसरे ट्रैक पर आ रही ट्रेन से टकराती है और रेलवे ट्रैक के किनारे जा गिरती है। घंटों बाद जब उसे होश आता है तो पता चलता है कि उसका एक पैर आधा कटकर जींस में लटक रहा है। वह जितनी ज़ोर से चिल्ला सकती थी चिल्लाई! लेकिन सूने रेलवे ट्रैक पर उसकी चीख सुनने के लिए कोई नहीं था। वक्त बदला...और आज पूरी दुनिया उसकी बात सुनती है। ये हैं अरुणिमा सिन्हा। माउंट एवरेस्ट फ़तह करने वाली पहली विकलांग भारतीय। जो आज world के ज्यादातर continent के highest पीक समिट कर चुकी हैं।

1. मेरा शरीर विकलांग हुआ मैं नहीं


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मैं लखनऊ से दिल्ली आ रही थी जिस समय मई 2011 में मेरे साथ ये दुर्घटना हुई। ...और तकरीबन 2 साल बाद अप्रैल 2013 में मैं एवरेस्ट फतह करने वाली पहली विकलांग भारतीय बन चुकी थी। ये परीकथा सा आसान नहीं था। उन बदमाशों ने मेरी गोल्ड चेन छीनने की कोशिश की और विरोध करने पर उन लोगों ने मुझे चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया। जब-जब मैं वो बीते दिन किसी के साथ शेयर करती हूं मेरा दर्द ताज़ा हो जाता है! कोई भी सिर्फ imagine कर सकता है कि उस लड़की पर क्या बीती होगी जो पूरी रात आधे कटे पैर के साथ रेलवे ट्रैक पर पड़ी रही। ट्रैक पर रहने वाले चुहें मेरे कटे पैर को कतर रहे थे और मेरे अंदर उन्हें भगाने की हिम्मत भी नहीं बची थी।

2. बिना एनेस्थेसिया के पैर कटवा दिया


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अगले दिन आस-पास के गांव के लोगों की नज़र मुझ पर पड़ी। उन्होंने उठाकर बरेली District hospital में admit कराया। लेकिन वहां एनेस्थिसिया और ब्लड नहीं था, इसलिए डॉक्टर्स मेरा पैर काटकर अलग करने का रिस्क नहीं ले रहे थे। वो आपस में बात कर रहे थे कि मुझे कहां रैफर करें ताकि time भी कम लगे और तुरंत treatment मिल सके। मैं उनकी बातें तो सुन रही थी लेकिन मेरी आवाज नहीं निकल रही थी कि कुछ बोल पाऊं। न जाने कहां से हिम्मत आई और मैं बोल पाई… डॉक्टर मैं पूरी रात अपने कटे पैर का दर्द सह सकती हूं तो अब तो आप मेरे भले के लिए पैर काटेंगे... मैं तैयार हूं आप बिना एनेस्थेसिया के ही काट दीजिए! मेरी हिम्मत देखकर डॉक्टर और फार्मासिस्ट ने मुझे अपना एक-एक यूनिट blood दिया और मेरे पैर का operation किया!

3. लोगों का काम है कहना


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एक Middle class फैमिली की बेटी, जो अब तक नेशनल लेवल की बॉलीबॉल प्लेयर थी, आज बिस्तर से उठने के लिए भी उसे दूसरों की मदद चाहिए थी। हमारे देश में वैसे भी लोगों के पास gossip करने का बहुत वक्त होता है। फिर मैं तो U.P. के अंबेडकर नगर की एक आम लड़की हूं। घटना हुई तो आस-पड़ोस के लोगों में भी बाते हुई...कोई कहता मैं Suicide करने गई थी, तो कोई कहता कि मेरे पास ticket नहीं था और टीटी के आने पर मैं train से कूद गई। मैं अपने दर्द से परेशान थी, उस पर ये बातें... मैंने ठान लिया एक दिन इन सबका मुंह बंद करना है। मैंने अपने दादा (मैं अपने जीजाजी को दादा कहती हूं) से कहा, दादा मैं एवरेस्ट पर जाना चाहती हूं। यकीन करना मुश्किल होगा कि जिस लड़की के स्टिच अभी खुले नहीं है, हॉस्पिटल के बैड पर वो एवरेस्ट पर जाने की बातें कर रही है और परिवार उसे सपोर्ट कर रहा है! लेकिन मेरे परिवार ने कहा अरुणिमा तुम ऐसा सोच सकती हो तो कर भी सकती हो।

4. घर नहीं गई मैं


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हॉस्पिटल से घर जाने के बजाय मैं अपने दादा के साथ बछेन्द्री पाल (1984 में एवरेस्ट पर जाने वाली पहली भारतीय महिला) के घर पहुंची। मेरी हालत देखकर उन्होंने कहा अरुणिमा अपने अंदर तो तुम एवरेस्ट फतह कर चुकी हो, अब तो केवल लोगों के लिए करना है। जिस लड़की का एक पैर prosthetic हो और दूसरे पैर में रॉड लगी हो, उस लड़की के एवरेस्ट फतह करने के इरादों पर family के अलावा किसी ने भरोसा किया तो वो केवल बछेन्द्री मैडम थीं। उन्होंने मुझे ट्रेनिंग दी और आगे की ट्रेनिंग के लिए guide किया। ट्रेनिंग के दौरान जिस दूरी को बाकी candidates चंद मिनट में पूरा करते थे मुझे उस दूरी को पार करने में 3 घंटे लगते थे। तब मेरा विश्वास और मेरे भगवान ही मेरी हिम्मत को बनाए रखते। फिर 8 महीने दिन वह भी आया जब मैं सबसे आगे चलती थी और वो लोग जो कभी मुझसे आगे रहते थे, पीछे छूटने लगे।

5. एक के बाद एक मुसीबत


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एवरेस्ट पर जाते समय एक शेरपा साथ में जाता है। मेरे शेरपा को जब ये बात पता चली कि मेरा एक पैर prosthetic और दूसरे पैर में रॉड और साथ ही स्पाइन में तीन फैक्चर हैं तो उसने मेरे साथ जाने से मना कर दिया। उस समय बछेन्द्री मैडम ने किसी तरह समझाया तो वह चलने को तैयार हुआ। वहां mount पर चढ़ते समय temperature माइनस में होने के कारण मेरा prosthetic leg आइस पर बार-बार स्लिप हो रहा था। तब मेरे शेरपा ने मुझे वापस चलने को कहा, मैं बोली... ये मेरा पैर है मैं जानती हूं कैसे चलेगा! एक स्टेप आगे बढ़ने के लिए मुझे 3 से 4 बार effort करना पड़ता। एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने से पहले ही मेरा oxygen cylinder खाली होने लगा, शेरपा ने फिर वापस चलने को कहा लेकिन मैं तैयार नहीं थी। डेढ़ घंटे बाद वो पल भी आया जब मैं दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर थी। मैंने अपने शेरपा से पिक लेने और वीडियो बनाने के लिए कहा तो वो नाराज़ होकर बोला, किसी भी वक्त तुम्हारा oxygen खत्म हो सकता है और तुम्हें रिकॉर्डिंग की पड़ी है... सच तो ये है कि मैं भी मान चुकी थी कि अब शायद मैं जिंदा न जा पाऊं! इसलिए वीडियो बनवाना चाहती थी ताकि मेरे देश के youth तक ये मैसेज़ पहुंचा सकूं कि एक physically challenged लड़की माउंट एवरेस्ट फतह कर सकती है तो आप तो कुछ भी कर सकते हैं!

6. God ने चाहा कि मैं जिंदा रहूं


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लौटते वक्त मेरा oxygen खत्म हो गया और मैं गिर पड़ी, लेकिन तभी एक माउंटेनियर जो एवरेस्ट पर जा रहा था खराब मौसम होने के कारण लौटने लगा। उसके पास oxygen के दो सेलेंडर थे और एक्सट्रा सेलेंडर वहीं फेंककर वो वापस लौटने लगा। क्योंकि वेट लेकर चढ़ने में जितनी दिक्कत होती है उतरने में उससे ज्यादा होती है। मेरे शेरपा ने देखा और दौड़कर मेरे लिए वो सेलेंडर ले आया। रिजल्ट-आज मैं आपके सामने जिंदा हूं। normal लोगों को कैंप 4 से एवरेस्ट समिट करने में आमतौर पर 16-17 घंटे लगते हैं। मुझे 28 घंटे लगे। हर कोई मान चुका था अरुणिमा जिंदा नहीं आएगी! ...लौटकर जब कैंप पहुंची तो मुझे देखकर हर कोई हैरान था।

source: Youtube.com , Arunima Sinha FB Profile
Published on Dec 08, 2015
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