#DilSeDilli: यकीन नहीं होता..इस वजह से मुझे नहीं मिली नौकरी | POPxo

#DilSeDilli: यकीन नहीं होता..इस वजह से मुझे नहीं मिली नौकरी

Riwa Singh

Writer, Hindi, POPxo

दिल वालों की दिल्ली में लोगों का आना-जाना लगा ही रहता है। लोग नए सपनों के साथ धड़कती हुई दिल्ली को महसूस करने आते हैं और कई बार यहीं के होकर रह जाते हैं। देश के हर कोने से दिल्ली आई लड़कियां कैसे जीती और महसूस करती हैं दिल्ली को, और दिलवालों की दिल्ली उन्हें कितना अपनाती है.. ये हम बताएंगे आपको हर बार “DilSeDilli” में।

इस बार DilSeDilli में हम बात कर रहे हैं बिहार(अररिया) से दिल्ली आयी नेहा से। नेहा ने पेंटिंग और म्यूज़िक में graduation किया है और साथ ही beautician में डिप्लोमा भी। इन्हें हार्मोनियम पर गाने का और खूबसूरत स्केचेज़ बनाने का बहुत शौक है।

1. आप दिल्ली कब और क्यों आईं?


मुझे दिल्ली आए अभी 5 महीने ही हुए। मैंने पेंटिग में ग्रेजुएशन किया है, पेंटिंग और म्यूज़िक में ही अपना करियर बनाना चाहती हूं इसलिए दिल्ली आई थी। दोस्तों ने कहा कि वहां अररिया (बिहार) में रहोगी तो तुम्हारा ये टैलेंट दबा रह जाएगा, तुम्हें दिल्ली जाना चाहिए। यहां मैं College of Arts में एडमिशन लेना चाहती थी पर स्टेट बोर्ड से होने की वजह से कट-ऑफ में फंस गई।

2. दिल्ली में कदम रखने के बाद आपका पहला reaction क्या था?


मुझे यहां पहले अपने रिलेटिव के घर जाना था। रेलवे प्लैटफॉर्म पर उतरते ही अचानक धक्-सी हो गई। सिर से पांव तक vibrate हो गई थी मैं। लगा.. यही वो जगह है जो मुझे बना सकती है। पर दिल्ली बहुत महंगी भी है, स्टेशन से बाहर आकर मैंने ऑटो रिक्शे वाले से रजौरी गार्डन चलने को कहा तो उसने मुझ से 250 रुपये मांगे, इतने में तो हम अपना पूरा टाउन घूम लेते थे।

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3. घरवालों ने यहां आने को लेकर कितना सपोर्ट किया?


घर में सभी सपोर्टिव हैं या आप यूं कह लें कि कोई सपोर्ट करने की condition में नहीं है इसलिए सभी ने सपोर्ट किया। पापा दिल के मरीज़ हैं, मम्मी की तबीयत भी आए दिन खराब रहती है इसलिए कोई मेरे साथ यहां नहीं आया। भाई हमेशा, हर सपोर्ट के लिए तैयार रहते हैं पर अभी वो भी करियर में struggle कर रहे हैं। यहां आने का एक और मकसद था AIIMS में अपने कानों का प्रॉपर चेकअप।

दरअसल बचपन से कानों से fluid निकलता था, तब किसी ने ध्यान नहीं दिया। आप जानती हैं छोटे जगहों पर ऐसी बातें अमूमन इग्नोर की जाती हैं। जब प्रॉब्लम बढ़ गयी तब पता चला कि मेरे दोनों कानों के पर्दे लगभग खराब हो चुके हैं। शाम के बाद जब तक कोई ऊंची आवाज़ में न बोले, मुझे आवाज़ तो आती है पर ये clear नहीं हो पाता है कि क्या बोला जा रहा है.. इसलिए मैं social gathering भी avoid करती हूं। लोग आपस में बात करते हैं और मैं चाहते हुए भी उसमें शामिल नहीं हो पाती हूं ये अपने आप में बहुत painful है।


4. क्या हमेशा से दिल्ली आने का मन था?


मुझे अररिया बहुत पसंद है, वहां मैं drawing classes चलाती थी, parlour चलाती थी। बहुत अच्छा फीडबैक मिलता था, मैं इस फील्ड में बहुत कुछ करना चाहती थी और मुझे यही लगता था कि दिल्ली मुझे वो मौका देगी, मैं यहां खुद को explore कर पाऊंगी। मैं यहां खुद को establish कर के वापस अपने घर जाना चाहती थी।

5. जो सपने देखे थे उसे दिल्ली ने कैसे और किस हद तक पूरा किया?


सच कहूं तो यहां आकर मुझे बहुत निराशा हुई, शायद इसलिए भी कि मुझे ये माहौल शुरू से नहीं मिला जैसा यहां सभी को मिल रहा है, और मैं खुद को इस रेस में पिछड़ा हुआ महसूस करने लगी। मुझे लगता है कि जितनी facilities दिल्ली के बच्चों और youth को मिलती हैं, देश के हर राज्य के लोगों को मिलनी चाहिए और अगर ऐसा होता है तो वे बेहतर कर पाएंगे। हमारे देश में टैलेंट की नहीं, exposure की कमी है। ख़ैर, मैंने IGNOU से आर्ट्स में post graduation के लिए apply कर दिया, अपना चेकअप भी कराना था.. कुछ पैसे बचा सकूं इसलिए राजौरी गार्डन के एक पार्लर में काम करना शुरू कर दिया।

6. यहां आने के बाद अपने struggle के बारे में बताएं?


बहुत प्रॉब्लम हुई.. यहां पर किसी को जानती नहीं थी और यहां के लोग मुझे virtually cooperative लगे। मतलब आपकी सीधे कोई हेल्प नहीं करेगा पर दिलासा सभी देंगे। कहीं कुछ काम मिलता भी था तो वहां के दूसरे employees अच्छा नहीं फील करते थे इसलिए मैं परमानेंट्ली जॉइन नहीं कर पाई।

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मैं एक ब्रांडेड पार्लर में गई थी। उन्होंने मेंरा skill-test लिया। क्वालिफाई करने के बाद documentation हुआ और मैंने join किया। बातों-बातों में उन्हें पता चला कि मैं सिर्फ बिहार से belong ही नहीं करती बल्कि अभी तक वहीं रही हूं और उसके बाद सबका reaction अजीब हो गया था - “बिहार से!!! फिर तो ये भी पता नहीं कि तुम कब बिना बताए छोड़ कर चली जाओ।” उनका बिहेवियर बदलता गया और अंत में मेरी जॉब छूट ही गई। मैं मानती हूं कि उनके इस रिएक्शन में बिहार से आए लोगों की भी ज़िम्मेदारी है, उन्होंने अपनी इमेज खराब की है.. पर अब बिहारी होना क्षेत्रीयता के लिए नहीं, गाली की तरह यूज़ किया जाता है और ये देश की राजधानी में फील करना बहुत disappointing है। इस घटना ने मुझे हताश कर दिया।

7. दिल्ली ने खुशी दी या निराश किया?


Actually, यहां आकर एहसास होता है कि दुनिया कितनी आगे बढ़ चुकी है और आप कितने पानी में हैं। दिल्ली ऐसी जगह है जहां बहुत ही कम समय में आपका मन लग जाएगा, पर कुछ प्रॉब्लम्स की वजह से मुझे यहां पर वो सपोर्ट नहीं मिला जिसकी उम्मीद थी। पर दिल्ली अपने आप में बहुत कुछ है।

8. दिल्ली क्यों सबसे अलग है?


दिल्ली की लाइफस्टाइल देखकर वाकई लगता है कि ये दिलवालों का शहर है। ये शहर 24 घंटे जागता है, ज़िंदगी को जी भर कर जीता है। मुझे यहां की ज़िंदादिली, यहां का भागमभाग और यहां के स्ट्रीट फूड बहुत पसंद हैं.. परहेज़ होने की वजह से मैं उनका लुत्फ़ नहीं उठा पाई और हर बार वो लज़ीज़ खाने देखकर लगता था कि काश! मैं ठीक होती तो जमकर खाती।

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9. दिल्ली को अगर तीन शब्दों में बयां करना हो तो..


ज़िंदादिल, खुशनुमा और inspiring। :) मैं दिल्ली से सीखती हूं शाम की थकान के बाद हर सुबह energetic होना। :)

Images: shutterstock.com
Published on Nov 25, 2015
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